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काशी हिंदू विश्वविद्यालय में संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण का मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी लंबित है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि हाईकोर्ट ने 30 अप्रैल 2026 को विश्वविद्यालय के कुलपति अथवा सक्षम प्राधिकारी को उनके प्रत्यावेदन पर तीन माह के भीतर विधि और सुप्रीम कोर्ट के प्रासंगिक फैसलों के आधार पर निर्णय लेने का निर्देश दिया था। निर्धारित अवधि पांच अगस्त को पूरी हो चुकी है, लेकिन अब तक विश्वविद्यालय की ओर से कोई आदेश जारी नहीं किया गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने नहीं लिया कोई फैसला याचिकाकर्ताओं के अनुसार, हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में छह मई को कुलपति को विस्तृत प्रत्यावेदन सौंपा गया था। इसकी प्रतिलिपि कुलसचिव को भी दी गई थी। प्रत्यावेदन में संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण और उससे जुड़े परिणामी लाभों पर निर्णय लेने का अनुरोध किया गया था। इसमें सुप्रीम कोर्ट के ‘जग्गो एवं अन्य’ मामले समेत नियमितीकरण से संबंधित अन्य न्यायिक निर्णयों का भी हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि हाईकोर्ट ने निर्णय के लिए स्पष्ट रूप से तीन माह की समयसीमा तय की थी। पांच अगस्त को अवधि पूरी होने के बावजूद न तो निर्णय की जानकारी दी गई और न ही कोई आदेश जारी हुआ। इससे अदालत के निर्देश के अनुपालन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला याचिकाकर्ताओं ने अपने प्रत्यावेदन में सुप्रीम कोर्ट के प्रासंगिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा है कि लंबे समय से लगातार सेवा दे रहे संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण के दावे पर केवल उनकी संविदा नियुक्ति के आधार पर विचार से इनकार नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि कर्मचारियों की सेवा की अवधि, कार्य की प्रकृति और संस्थान में उनकी आवश्यकता समेत सभी संबंधित पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने विश्वविद्यालय प्रशासन से हाईकोर्ट के निर्देश के अनुरूप शीघ्र आदेश जारी करने की मांग की है। उनका कहना है कि नियमितीकरण के साथ उससे जुड़े सभी परिणामी सेवा लाभों पर भी विधिसम्मत निर्णय लिया जाना चाहिए।
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