‘आओ भरत! तनिक बैठो, मैं मन की बात सुनाती हूं,
.
रघुकुल के इस सिंहासन पर, तुझको बैठा देखना चाहती हूं।’
युवा कवयित्री वैष्णवी शर्मा माता कैकेयी के रूप में संवाद शुरू करती हैं। सामने से भरत बने आशुतोष राणा की पीड़ा सुनाई पड़ती है-
‘माते…यह तुमने क्या कीन्हा? कुल के दीपक को बुझा दिया।’
भरत-कैकेई संवाद में कैकेई के संवाद कहने वाली वैष्णवी को उनकी दमदार प्रस्तुति के लिए काफी सराहा गया।
वह कहती हैं- मैं अपने पापा सतीश शर्मा की लिखी हुई कविताओं को मंच से पढ़ती हूं। लेकिन, सोशल मीडिया पर कई बार कविता की लाइनों के मायने लोग आधा-अधूरा समझते हैं। ऐसा ही शिशुपाल वध पर लिखी कविता को पढ़ते वक्त हो चुका है। इसमें लाइनें थीं-
है कृष्ण निकम्मा नकारा, काला अनपढ़ गंवार निपट। वनवासी सा पहनावा है, अंदर बाहर है भरा कपट। मां-बाप का इसके पता नहीं, न गोत्र वंश का लेखा है। घर-घर माखन चोरी करता, जाने इसमें क्या देखा है।।
वीडियो सामने आते ही हंगामा हो गया। लोग ट्रोल करने लगे। वो यह मानने को तैयार नहीं थे कि यह बात शिशुपाल ने श्रीकृष्ण से कही थीं। इसके बाद ही श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध किया था। फिर द्रौपदी चीरहरण पर आधारित वैष्णवी शर्मा की कविता ‘कुपित याज्ञसेनी’ लोकप्रिय हुई। इसे उनके यूट्यूब चैनल पर 3.4 मिलियन लोगों ने देखा। पूरा इंटरव्यू पढ़िए…

भरत कैकेई संवाद में वैष्णवी के साथ स्क्रीन आशुतोष राणा ने शेयर किया।
सवाल. आप खुद का परिचय कैसे देती हैं? वैष्णवी. मेरा नाम वैष्णवी शर्मा है। जन्म लखनऊ में हुआ। मेरे पिता सतीश सृजन आर्मी में हैं, वह कविताएं लिखते हैं। मैं उनकी कविताओं को मंच पर बांसुरी और शास्त्रीय रागों की संगत के साथ पेश करती हूं। आर्मी बैकग्राउंड के चलते हम अलग-अलग जगहों पर रहे। इसका फायदा यह हुआ कि अलग-अलग जगहों के कल्चर को सीखते और अपनाते चले गए।
सवाल. आपका असली नाम वैष्णवी शर्मा है, लेकिन स्टेज पर आप राग वैष्णवी के नाम से जानी जाती हैं?
वैष्णवी. मेरा असली नाम वैष्णवी शर्मा ही है। असल में शास्त्रीय गायन में राग दुर्गा, राग सरस्वती, राग भैरवी तो है, लेकिन राग वैष्णवी नहीं मिला। इसलिए हमने इसी नाम से यूट्यूब और इंस्टाग्राम अकाउंट बना लिया। लोग इसी नाम से मुझे जानने लगे। यूट्यूब पर 2 लाख से ज्यादा और इंस्टाग्राम पर 90 हजार से ज्यादा लोग मुझसे जुड़ गए।
सवाल. आपको भाषा, कविता और भारतीय दर्शन की ओर किस चीज ने सबसे ज्यादा आकर्षित किया?
वैष्णवी. सबसे पहला श्रेय अपने आर्मी बैकग्राउंड को दूंगी। इतनी जगहों पर गए और रहे, यह सब कुछ दिमाग पर बहुत असर डालता है। मेरे दादा से मुझे उर्दू साहित्य के बारे में बहुत कुछ सुनने को मिला। मेरी नानी की प्रिंसिपल महादेवी वर्मा थीं। उनके बारे में तो हम लोग बचपन से ही सुनते चले आ रहे हैं। मेरे पिता ने हिंदी साहित्य की पढ़ाई की है। इन सबके अलावा हमारे यहां संवाद और मंथन का बहुत महत्व रहा है। बचपन में जो कुछ सुना, बड़े होकर वही सब देख रही हूं। इसका पूरा श्रेय घरवालों को ही जाता है।

वैष्णवी शर्मा ने कहा कि घर के माहौल से मुझे बहुत मदद मिली।
सवाल. आप कई बार मंचों से कहती हैं कि हम हिंदी को युवाओं के लिए कूल बनाना चाहते हैं?
वैष्णवी. हिंदी कूल है, यह बात मुझे पता है। मुझे यह भी पता है कि बहुत सारे लोग यह नहीं जानते। जब मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने गई, तब देखा कि बहुत सारे लोग हिंदी में लिख ही नहीं पाते। वह अंग्रेजी की रोमन लिपि का प्रयोग करते हैं। जब यह सब देखा तो मेरे मन में ख्याल आया कि ये लोग वंचित न रह जाएं। इसलिए चाहती हूं कि हर किसी को इससे जोड़ा जाए। बाकी जैसे हर फोटो का एक निगेटिव बनता है, उसी तरह से हर कल्चर भी अपने साथ एक निगेटिव लेकर चलता है।
सवाल. आपकी सबसे पॉपुलर परफॉर्मेंस ‘कुपित याज्ञसेनी’ है। आपने इसे कैसे जीवंत किया?
वैष्णवी. कुपित याज्ञसेनी कविता द्रौपदी वस्त्रहरण पर आधारित है। इसे हम स्टेज पर राग धनाश्री और राग टिल्लू के साथ प्रेजेंट करते हैं। यह कविता कुल मिलाकर विश्वास को एक्सप्लोर करती है। जैसे द्रौपदी जब तक अपने पति पर निर्भर थीं, तब तक तर्क-कुतर्क चल रहा था। आखिर में हार गईं। फिर उन्होंने कृष्ण को याद किया। यानी उनके ऊपर विश्वास किया और भगवान कृष्ण ने उन्हें बचाया।
कुपित याज्ञसेनी को लेकर एक चीज यह भी कहना है कि इसे हमने आर्काइव में सेव करने के लिए बनाया था, फिर शेयर हो गया। बहुत सारे लोगों ने शेयर किया। मेरे दोस्त वीडियो भेजकर पूछते थे, ‘देखो, इसमें तुम ही हो न? मैं उनसे कहती कि हां, मैं ही हूं…।
सवाल. लाइव शो में कभी कोई मजेदार घटना हुई?
वैष्णवी. मेरे साथ लाइव में तो ऐसा कुछ नहीं हुआ, लेकिन सोशल मीडिया पर जरूर हुआ है। मैंने शिशुपाल वध पर एक कविता पेश की थी। असल में शिशुपाल ने 100 गालियां दी थीं, श्रीकृष्ण माफ करते चले गए। जैसे ही 101वीं गाली दी, कृष्ण ने शिशुपाल का वध कर दिया। शिशुपाल की इन्हीं 100 गालियों के प्रसंग पर एक कविता कही थी। लोगों ने इसे काट-छांटकर पेश कर दिया। उसमें ऐसा लगा कि जैसे मैं ही श्रीकृष्ण को गाली दे रही हूं।

वैष्णवी का कहना है कि हिंदी को लेकर बहुत कठिन होने से बचना होगा, तभी लोग इसको पूरी तरह से स्वीकार कर सकेंगे।
सवाल. आप किन प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही हैं?
वैष्णवी. मैं पिछले 4 सालों से स्टेज शो कर रही हूं। इसके पहले थिएटर वगैरह करती थी। अभी कुछ गाने भी हैं, जो आगे आएंगे।
सवाल. क्या आप फिल्म या वेब सीरीज में काम करना चाहेंगी?
वैष्णवी. मैं फिल्म इंडस्ट्री में काम कर चुकी हूं। तमिल वेब सीरीज ‘द जर्नी’ में मैंने डायलॉग लिखे थे। असल में इसके सारे शो तमिल में ही हैं। एक हिंदी एपिसोड था, उसमें हमने डायलॉग लिखे हैं।
सवाल. अगर भारतीय कला जगत में कोई एक सुधार करना हो तो क्या करेंगी?
वैष्णवी. मेरे जीवन में कला का फैक्टर तो मेरे पिता संभाल रहे हैं। मुझे लगता है कि भाषा को लेकर बहुत प्योरिस्ट हो जाना नुकसान करता है। इससे भाषा का ही पोषण छिन जाता है। ऐसा करके हम सबने संस्कृत को एलीट और दूर की भाषा बना दिया। वह आम लोगों से दूर हो गई। अब वही संस्कृत बोलता और पढ़ता है, जो उसकी पढ़ाई कर रहा है। हम नहीं चाहते कि हिंदी की भी ऐसी स्थिति हो। लेकिन, इसका कतई मतलब नहीं कि भाषा की गरिमा गिरा दी जाए।

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