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17 जून को बिहार के भोजपुर में पुलिस एनकाउंटर में मारे गए भरत तिवारी का मामला उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी असर डाला रहा है। यूपी और बिहार बॉर्डर पर स्थित इस जिले की होने वाली हर गतिविधि पूर्वांचल में महसूस की जा रही है। ‘ब्राह्मण बनाम बहुजन’ का रूप

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पूर्वांचल में 14% तक ब्राह्मण हैं। यहां की 125 सीटों पर जीत-हार तय करने में बड़ा रोल निभाते हैं। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय आरा पहुंचे। लखनऊ में ब्राह्मण संगठनों ने कैंडल मार्च निकाला। सोशल मीडिया पर इसे ब्राह्मण अस्मिता के सवाल से जोड़ने की कोशिशें तेज हुईं। UP के 22 जिलों से लोग भरत तिवारी के घर पहुंचे।

ऐसे में सवाल है कि क्या यह मामला अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक राजनीतिक मुद्दा बन सकता है, या समय के साथ इसकी धार कम हो जाएगी? आइए जानते हैं…।

सबसे पहले जानिए पूर्वांचल में क्यों सुनाई दे रही भरत तिवारी एनकाउंटर की गूंज?

अगर यह एनकाउंटर UP की सीमा से दूर बिहार के किसी जिले में होता तो संभव है कि उसका राजनीतिक असर सीमित रहता। लेकिन भरत तिवारी की मौत भोजपुर जिले के जगदीशपुर में हुई जो उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल से सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़ा है।

  • आरा, बक्सर, गाजीपुर और बलिया के बीच रोज हजारों लोगों की आवाजाही होती है। बड़ी संख्या में परिवारों के रिश्ते दोनों राज्यों में फैले हुए हैं।
  • भोजपुरी भाषा, समान सामाजिक संरचना और साझा सांस्कृतिक पहचान इस पूरे इलाके को राजनीतिक रूप से भी जोड़ती है।
  • यही वजह है कि बिहार की बड़ी घटनाएं अक्सर पूर्वांचल में राजनीतिक चर्चा का विषय बन जाती हैं।
  • चाहे अपराध, बड़ा आंदोलन या जातीय विवाद हो, उसकी प्रतिक्रिया गाजीपुर, बलिया, चंदौली और वाराणसी तक पहुंचती रही है।
  • ऐसे में उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय का जगदीशपुर के बिलौटी गांव जाकर पीड़ित परिवार से मिलना बड़ा राजनीतिक संदेश माना गया।
  • यह सिर्फ संवेदना जताना भर नहीं था। इससे पता चलता है कि कांग्रेस इस मुद्दे को उत्तर प्रदेश की राजनीति में उठाना चाहती है।

7 दिन बाद सरकार के बैकफुट आने पर उठने लगे सवाल

भरत तिवारी मामले में शुरुआती दिनों में पुलिस का दावा था कि यह अपराधियों के खिलाफ सही कार्रवाई थी। सात दिन बाद भरत की मां आशा देवी की शिकायत पर तत्कालीन डीएसपी, थाना प्रभारी और अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या समेत गंभीर धाराओं में FIR दर्ज की गई।

ऐसे में विपक्ष सवाल उठाने लगा कि यह फर्जी एनकाउंटर था। मीडिया और विपक्ष के दबाव में ही सरकार ने मुकदमा दर्ज कराया। इसके बाद उत्तर प्रदेश, दिल्ली और एमपी से लोग यहां आने लगे। सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल से लोग यहां पहुंचे। पूर्वांचल के करीब 22 जिलों से लोग यहांं आए। देखते-देखते भरत तिवारी के समर्थन में सवर्णों के कई संगठन खड़े हो गए।

लखनऊ का कैंडल मार्च क्यों बना राजनीतिक संकेत?

भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में लखनऊ में ब्राह्मण संगठनों ने कैंडल मार्च निकाला और निष्पक्ष जांच की मांग की।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण समाज लंबे समय से प्रभावशाली माना जाता है। राज्य की कुल आबादी में उनकी हिस्सेदारी 10 प्रतिशत तक है। यह समुदाय पूरे प्रदेश में फैला हुआ है। बड़ी संख्या में सीटों पर ये जीत-हार तय करने में भूमिका निभाते हैं।

भाजपा के लिए चुनौती यह है कि ब्राह्मण वोट का छोटा-सा हिस्सा भी विरोध में न चला जाए। कई सीटों पर जीत और हार का अंतर पांच हजार से भी कम वोटों का रहा है।

क्या भरत तिवारी मामले से प्रभावित होंगी पूर्वांचल की 125 सीटें?

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से करीब 125 पूर्वांचल में आती हैं। किसी भी दल के लिए सरकार बनाने का रास्ता काफी हद तक इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है।

  • वाराणसी, गोरखपुर, बलिया, गाजीपुर, चंदौली, जौनपुर, मऊ, आजमगढ़, देवरिया, बस्ती, संत कबीर नगर, कुशीनगर, महाराजगंज, प्रयागराज, भदोही और मिर्जापुर जैसे जिले इसी क्षेत्र का हिस्सा हैं।
  • यहां ब्राह्मण मतदाताओं की हिस्सेदारी औसतन 10 से 14 प्रतिशत के बीच मानी जाती है। कई सीटों पर यह आंकड़ा इससे भी अधिक है।
  • लगभग पूरे उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का राजनीतिक प्रभाव उनकी आबादी से कहीं अधिक माना जाता है।
  • पश्चिम से लेकर पूर्वांचल और बुंदेलखंड तक शायद ही कोई ऐसा जिला हो, जहां उसकी प्रभावी मौजूदगी न हो।
  • 1990 के दशक तक कांग्रेस का सबसे भरोसेमंद सवर्ण वोट बैंक ब्राह्मण समाज माना जाता था। मंडल राजनीति के बाद भाजपा ने इस वर्ग में अपनी मजबूत पैठ बनाई।
  • 2014 के लोकसभा चुनाव, 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को ब्राह्मण समाज का बड़ा समर्थन मिला।
  • यही वजह है कि पार्टी ने संगठन से लेकर सरकार तक ब्राह्मण नेताओं को लगातार प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की।
  • राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती ब्राह्मण वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखना है।

कांग्रेस ने बिहार में पहुंचकर बनाया बड़ा मुद्दा

भरत तिवारी मामले में सबसे पहले उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय का आरा पहुंचना संयोग नहीं माना जा रहा। कांग्रेस पिछले कुछ वर्षों से उत्तर प्रदेश में अपना सामाजिक आधार फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ब्राह्मण समाज के बीच संवाद बढ़ाना भी उसकी रणनीति का हिस्सा रहा है।

अजय राय के दौरे के बाद लखनऊ में ब्राह्मण संगठनों के विरोध प्रदर्शन ने इस मुद्दे को और राजनीतिक बना दिया। कांग्रेस की कोशिश इस मामले को “ब्राह्मण बनाम सरकार” बनाने की है।

समाजवादी पार्टी अभी अपेक्षाकृत सतर्क दिखाई दे रही है। इसकी वजह उसका व्यापक सामाजिक गठबंधन है। पार्टी ऐसा कोई संदेश नहीं देना चाहेगी जिससे उसके परंपरागत वोट बैंक और संभावित नए सामाजिक समर्थन के बीच टकराव की स्थिति बने। बहुजन समाज पार्टी भी फिलहाल संयमित रुख अपनाए हुए है।

‘ब्राह्मण VS बहुजन’ नैरेटिव क्यों बिल्ट हो रहा है?

भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद सोशल मीडिया पर इस घटना को अलग-अलग नजरिए से पेश किया गया। कुछ पोस्ट में इसे ब्राह्मण समाज के सम्मान का सवाल बताया गया, जबकि कुछ लोगों ने इसे पुलिस की अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया।

भरत तिवारी के समर्थन में भोजपुर में महापंचायत की गई। इस महापंचायत में उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, मध्यप्रदेश के कई ब्राम्हण और सवर्णों के अन्य संगठन के प्रतिनिधि पहुंचे। बड़ी बात यह है कि भरत तिवारी के गांव से उठने वाले इस आंदोलन को चलाने वाले ज्यादातर ब्राह्मण ही रहे।

इस महापंचायत के विरोध में बिहार में कुशवाहा समाज यानी सम्राट चौधरी को मजबूती दिखाने के लिए एनकाउंटर के समर्थन में बहुजन महापंचायत का ऐलान किया गया। सोशल मीडिया पर जोर शोर से प्रचार हुआ। जगह–जगह पोस्टर लगाए गए, लेकिन सरकार ने इसकी इजाजत नहीं दी।



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