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आज सावन का आखिरी सोमवार है। सावन के आखिरी सोमवार को महाभारतकालीन बाबा वनखंडीनाथ मंदिर में आधी रात से ही भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। जोगी नवादा क्षेत्र में स्थित बाबा वनखंडीनाथ मंदिर बरेली के सबसे चर्चित शिवालयों में शामिल है। मंदिर की पहचान महाभारतकालीन मान्यताओं, घने जंगल और मुगलकाल से जुड़ी लोककथाओं के कारण अलग है। इसे बरेली के सात नाथ मंदिरों में शामिल किया जाता है। द्रौपदी से जुड़ी है स्थापना की मान्यता
वनखंडीनाथ मंदिर का इतिहास महाभारत काल तक जाता है। कहा जाता है कि द्रौपदी ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। अज्ञातवास के समय द्रोपदी पांचों पांडवों के साथ बरेली के जोगी नवादा पहुंची और यहां पर उन्होने शिवलिंग की स्थापना की। उस समय यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा था। मंदिर की इसी वन क्षेत्र वाली पहचान के कारण इसका नाम वनखंडीनाथ पड़ा। औरंगजेब के दौर की चर्चित कहानी
मंदिर से जुड़ी सबसे ज्यादा चर्चा वाली कहानी मुगलकाल की है। औरंगजेब के शासनकाल में मंदिर को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई। शिवलिंग को जंजीरों से बांधकर 100 हाथियों से खिंचवाने की कोशिश की गई, लेकिन शिवलिंग अपनी जगह से नहीं हिला। मंदिर से जुड़ी कथाओं में यह भी कहा जाता है कि आज भी शिवलिंग पर जंजीर के निशान दिखाई देते हैं। इसके अलावा दिन में 3 बार ये शिवलिंग रंग बदलता है। शिवगंगा सरोवर की भी मान्यता
मंदिर परिसर में शिवगंगा सरोवर भी है। इसके चारों ओर 108 शिवलिंग की स्थापना करीब 5 साल पहले करवाई गई। मंदिर की परंपरा में इसे आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। तपस्या और साधना का केंद्र
मंदिर परिसर में साधु-संतों की समाधियों का भी उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि यह स्थान सिर्फ पूजा का केंद्र नहीं रहा, बल्कि लंबे समय तक साधना और तपस्या की परंपरा से भी जुड़ा रहा।
आज सावन और महाशिवरात्रि पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। द्रौपदी से जुड़ी मान्यता, जंगल की कहानी और शिवलिंग को न हिला पाने वाली लोककथा वनखंडीनाथ को सातों नाथ मंदिरों में सबसे अलग पहचान देती है।
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