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गोमती नगर स्थित होटल रणबीर में लखनऊ क्लब की ओर से शनिवार कों ‘समुद्री यात्रा वृतांत’ विषय पर चर्चा हुई। इसमें शहर के प्रशासन, पत्रकारिता, शिक्षा, चिकित्सा और अन्य क्षेत्रों से जुड़े कई प्रबुद्ध लोग शामिल हुए। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर रिटायर्ड मेजर ए.के सिंह शामिल हुए। उन्होंने समुद्री यात्रा के अनुभव साझा किए। मेजर ए.के. सिंह की कहानी सिर्फ समुद्र की लहरों से जूझने की नहीं, बल्कि हौसले और जिद की कहानी है। एक पैर गंवाने के बाद भी उन्होंने दुनिया की समुद्री परिक्रमा का सपना नहीं छोड़ा। आखिरकार 15.5 महीने में 50 हजार किलोमीटर का सफर पूरा कर इतिहास रच दिया। मेजर ए.के सिंह ने बताया कि हिंदुस्तान की पहली स्वदेशी पाल नौका से विश्व की पूरी समुद्री परिक्रमा का अभियान 1985 से 1987 के बीच पूरा किया गया। करीब 15.5 महीने में 50 हजार किलोमीटर यानी 30 हजार नॉटिकल मील का सफर तय किया गया। इस अभियान की योजना 1978 में शुरू हुई थी। उस समय भारत में न तो पर्याप्त तकनीक थी, न उपकरण और न ही पैसे। किताबों और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर पूरी योजना तैयार करनी पड़ी। यह प्रोजेक्ट ‘कोर ऑफ इंजीनियर्स’ के सेलिंग क्लब से शुरू हुआ और बाद में सेना मुख्यालय से होते हुए रक्षा मंत्रालय तक पहुंचा। 4-5 साल बाद मिली मंजूरी सरकार को इस अभियान को मंजूरी देने में करीब 4-5 साल लग गए। आर्थिक मदद नहीं मिली, लेकिन सेना के अधिकारी होने के नाते अभियान में जाने की अनुमति दी गई। 15 महीने से अधिक के अभियान के लिए विशेष ‘कैजुअल लीव’ दी गई।लेकिन मंजूरी मिलने से करीब एक साल पहले ही मेजर ए.के. सिंह के साथ बड़ा हादसा हो गया। पुणे में हैंग ग्लाइडिंग के दौरान उनका एक्सीडेंट हो गया। हादसे में उनका बायां पैर घुटने के ऊपर से काटना पड़ा।
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