बदायूं में गंगा नदी का उफान खतरनाक होता जा रहा है। सिर्फ 5 मिनट में सरकारी स्कूल की पूरी बिल्डिंग धारा में समा गई। कुछ दीवारें ही बची हैं। ये स्कूल कदमनगला गांव में है। यहां पढ़ने वाले बच्चों को दूसरे गांव के प्राथमिक विद्यालय में भेजा गया। लेकिन बाढ़
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करीब एक हजार बीघा खेतों में खड़ी फसलें डूब चुकी हैं। ये तबाही गंगा की धारा के मुड़ने की वजह से हुई। लोग तो सुरक्षित जगह पर चले गए, लेकिन उनके घर और खेत जलमग्न हो गए।
गांव के लोग कहते हैं- नदी बहुत तेजी से गांव की जमीन काट रही है, ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। तीन बार पहले भी गांव कटकर नदी में समा चुका है। हर बार लोग नदी से दूर जाकर खेतों में घर बना लेते थे, मगर अब स्थिति बदल चुकी है। अब इतने खेत ही नहीं बचे कि गांव के इतने परिवार वहां जाकर बस सकें। ऐसे में इस बार गांव का अस्तित्व ही खत्म होने की कगार तक पहुंच चुका है।

गांव में बाढ़ का पानी दाखिल हो चुका है। ज्यादातर लोग घर छोड़कर जा चुके हैं।
दहशत में लोग, घरों पर छत नहीं डाली, बोले- न जाने कब बह जाए
बदायूं जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर कदमनगला गांव है। इसके नजदीक रैपुरा, दमनगला, जटा समेत कई गांव हैं। इस वक्त ये सभी गांव बाढ़ और कटान की चपेट में हैं। इन गांव में पहुंचने के लिए अब पक्का रास्ता नहीं बचा। कच्चे और गड्ढों से भरे रास्तों से होकर लोग आ-जा रहे हैं। इनमें भी 1 से 2 फीट तक पानी भरा हुआ है।
कदमनगला, दमनगला, रैपुरा जैसे गांव में करीब 100 घर हैं, कोई भी दो मंजिल का नहीं है, ज्यादातर लोगों ने तो घर पर छत भी नहीं डलवाई है, कारण पूछने पर कहते हैं- ‘हमेशा डर बना रहता है कि न जाने कब गंगाजी में आई बाढ़ हमारे घर बहा ले जाए। इसलिए सिर्फ सिर छिपाने लायक ही बनाया है।’

सड़कें डूब चुकी हैं। यहां 2 से 3 फीट तक पानी भरा हुआ है।
60 साल में 3 बार गांव खत्म होकर नई जगह बसता रहा
कदमनगला गांव में हमारी मुलाकात राम सिंह से हुई। वह कहते हैं- 1965 में हम जहां रहते थे, उसका नाम खेड़ा पुख्ता था। गंगा नदी में बाढ़ आई, पूरा गांव ही डूब गया। जमीनें कट गईं, पानी कम हुआ, लेकिन नदी अपना रास्ता बदल चुकी थी।
फिर हम लोग दूसरी तरफ बस गए। गांव का नाम पड़ा कदमनगला। 10 साल तक हम सब वहीं रहे, फिर नदी बाढ़ आ गई। एक बार फिर हमारे दरवाजे तक पानी पहुंचा। फिर कटान में वहां की जमीनें भी चली गईं।
इसके बाद हम सब अपने ही खेतों में आकर रहने लगे। यहां करीब 20 साल से रह रहे हैं। अब नदी ने तीसरी बार अपना रास्ता बदला है। एक बार फिर पूरे गांव में पानी पहुंच गया है। जमीनें कट रही हैं, धारा फिर डरा रही है।
‘बाबा, पिता और हमने बाढ़ देखी, अब बच्चों को ये नहीं झेलने देंगे’
ग्रामीण राम सिंह कहते हैं- ‘अभी तक तो हम अपने खेतों की तरफ जाते चले गए, लेकिन अब हमारे पीछे फर्रुखाबाद के गांव लगते हैं, हमारा खेत भी कट गया, अब समझ नहीं आता कि कहां जाएं? बाकी मेरे बाबा ने, पिता ने, हमने बाढ़ का संकट देखा, अब हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चे इसे झेलें, हम तो यही चाहते हैं कि वह कहीं भी जाकर मजदूरी कर लें, लेकिन यहां से चले जाएं।’

राम सिंह कहते हैं- ‘यहां रहने वालों की किस्मत में जैसे बाढ़ लिखी हुई है, कोई कुछ करता भी नहीं है।’
कृपाल बोले- सरकार के लोग देखकर चले जाते हैं, होता कुछ नहीं
गांव में 90 साल के कृपाल सिंह यादव सबसे बुजुर्ग व्यक्ति हैं। वह हाथ उठाकर कहते हैं- ‘ये सब गंगा मइया की कृपा है। हमने पूछा आपका घर कटान में गया, फिर खेत गया, इसे कृपा कैसे मान रहे हैं?’ कृपाल सिंह कहते हैं- ‘हम इसे और क्या कहें, जो तय है, वही हो रहा है। ऐसे ही गुजर-बसर हो रही है। यहां किसी तरह की कोई सुविधा नहीं है। सरकार के लोग आते हैं, देखते हैं और फिर चले जाते हैं। यहां के लोग भी बाहर जाकर मजदूरी करने लगे हैं, क्योंकि उनका खेत ही नहीं बचे।’

गंगा नदी की धारा हर दिन 15 से 25 मीटर तक जमीन काट रही है।
‘हम यही सोचते हैं कि बांध बन जाए, तो जमीनें बच जाएं’
38 साल के अमित यादव का घर इस वक्त नदी से महज 100 मीटर की दूरी पर है। वह कहते हैं- हमने बाहर जाकर पढ़ाई की, नौकरी के चक्कर में घूमते रहे, नौकरी नहीं लगी तो वापस यहीं आ गए। आखिर छोड़कर जाएं भी तो कहां जाएं। भविष्य को लेकर बस यही सोचते हैं कि सरकार यहां बांध बना दे, हमारे खेत बच जाएंगे तो हमारी स्थिति ठीक हो जाएगी।

ये वही स्कूल है, जो गंगा की धारा में समा चुका है। अब सिर्फ दीवारें दिख रही है।
स्कूल ढहने के बाद दूसरे स्कूल में बच्चे भेजे, वहां टीचर ही नहीं
कदमनगला गांव का अपर प्राथमिक विद्यालय अब नदी में समा चुका था। इस स्कूल में कुल 41 बच्चे पढ़ते थे। सभी को नजदीक के गांव दमनगला प्राथमिक विद्यालय में शिफ्ट कर दिया गया। 2 किमी दूर इस प्राथमिक विद्यालय में पहले से 43 बच्चे थे, इन्हें पढ़ाने के लिए दो टीचर थे, अब वही दो टीचर छठी से आठवीं कक्षा तक के बच्चों को भी पढ़ा रहे हैं। यह स्कूल भी इस वक्त बाढ़ की चपेट में है।
बाढ़ के चलते करीब 20 बच्चे ही स्कूल आ रहे हैं। हम जब पहुंचे तो स्कूल में छुट्टी हो चुकी थी। टीचर दिलशाद हुसैन स्कूल के ही बगल बैठे मिले। वह अब यहीं गांव में रहते हैं। बाढ़ के बीच स्कूल को लेकर दिलशाद कहते हैं- ‘कदमनगला स्कूल में पहले से भी कोई स्थायी टीचर नहीं था, दूसरे स्कूल के टीचर की ड्यूटी लगी थी, अब स्कूल गिर गया, तो वह चले गए।
बाकी बच्चे इधर आ गए, मैं और प्रिंसिपल सर मिलकर बच्चों को पढ़ा लेते हैं। वैसे अभी कदमनगला के सिर्फ 2-3 बच्चे ही पढ़ने आ रहे हैं, क्योंकि वहां बाढ़ है, कई बच्चों को तो हम बाइक से छोड़ने जाते हैं।’
वह कहते हैं- ‘कुछ साल पहले तक मैं सोनभद्र में तैनात था। वहां गांव के अंदर भी पक्के रास्ते बने हुए थे। मगर यहां तो आने-जाने के रास्ते ही नहीं हैं। हमें गांव के हालात बताने के बाद वह 3 फीट पानी के अंदर ही बाइक लेकर नजदीकी कस्बे की तरफ चल दिए। पानी इतना था कि बहुत मुश्किल से बाइक चल पा रही थी।’

दिलशाद कहते हैं- ‘यहां के हालात सुधारने का सरकार को प्लान तैयार करना चाहिए।’
‘अधिकारी आए, लेकिन किसी ने कुछ किया नहीं’
गांव के प्रधान राकेश कश्यप कहते हैं- ‘हमारे गांव की सैकड़ों बीघा जमीन इस साल नदी में समा चुकी है। अब हर दिन 10 से 15 मीटर जमीन कटकर नदी में समाए जा रही है। गांव में अभी करीब 25 घर हैं। सभी पर खतरा मंडरा रहा है। दो बार एसडीएम आए, बाढ़ खंड के अधिकारी आए। उन्होंने कहा भी कि जलस्तर कम होगा तो हम बांध बनवाने पर विचार करेंगे।’
प्रधान के पास खड़े जितेंद्र कहते हैं- ‘अधिकारी आते तो हैं, लेकिन देखकर फिर चले जाते हैं। कटान रोकने की व्यवस्था हो तो बहुत अच्छा होगा। हम लोगों के पास नौकरी तो है नहीं, जमीन बच जाएगी तो अपने बच्चों को खिला-पिला लेंगे।’

राकेश कश्यप कहते हैं- ‘मैं 2 बार गांव की जमीन कटने से घर छोड़ चुका हूं, अब जाने क्या होने वाला है।’
‘सरकार कहीं दूसरी जगह पट्टा दे, तो छोड़कर वहीं चले जाएं’
गांव के श्यामवीर कहते हैं- ‘अब यहां रहना ठीक नहीं है। कहीं पट्टा वगैरह मिल जाए तो हम यहां से सामान निकालकर वहीं चले जाएं। पहले भी हमारा घर नदी में चला गया था। फिर अपने खेत में घर बनाकर रहने लगे। अब सारा खेत चला गया। जहां घर बनाया है, वह भी जाने वाला है। लगता है कि सब खत्म हो रहा है।’

श्यामवीर ने कहा- ‘हमारा परिवार बहुत परेशान है, सब डरे हुए हैं।’
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