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मेरठ में आठ जुलाई को कलेक्ट्रेट पर हुए दलित समाज के प्रदर्शन और उसके बाद हुई पुलिस कार्रवाई का मामला अब अदालत पहुंच गया है। दलित अधिवक्ता अनिल प्रधान ने विशेष न्यायाधीश एससी/एसटी कोर्ट में याचिका दाखिल कर एसएसपी अविनाश पांडे, एसपी देहात अभिजीत कुमार तथा 50 अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने जाने की मांग की है। याचिका में पुलिस अधिकारियों पर दलित समाज के लोगों के साथ अभद्रता, मानवाधिकारों के उल्लंघन और जातिवादी मानसिकता से कार्रवाई करने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता अधिवक्ता अनिल प्रधान का आरोप है कि ललिता गौतम हत्याकांड की विवेचना में पुलिस ने निष्पक्षता नहीं बरती और आरोपियों को बचाने का प्रयास किया। इसी के विरोध में दलित समाज के लोग आठ जुलाई को जिलाधिकारी से मिलने और अपनी बात रखने के लिए कलेक्ट्रेट पहुंचे थे। आरोप है कि पुलिस ने कलेक्ट्रेट के दरवाजे बंद कर दिए और प्रदर्शनकारियों को गेट के बाहर सड़क पर बैठने के लिए मजबूर किया। इससे लोगों में आक्रोश फैल गया। जानबूझकर बेइज्जत करने का आरोप
याचिका में कहा गया है कि पुलिस अधिकारियों ने दलित समाज के लोगों के साथ जानबूझ कर भेदभावपूर्ण व्यवहार किया और बाद में प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया। अनिल प्रधान का आरोप है कि शांतिपूर्ण धरना दे रहे लोगों पर लाठीचार्ज कराया गया तथा पुलिस अधिकारियों ने स्वयं भी हाथापाई की। उन्होंने दावा किया कि इस घटना के वीडियो और अन्य साक्ष्य सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं, जो पुलिस कार्रवाई की वास्तविकता को दर्शाते हैं। फर्जी मुकदमे दर्ज कराने का आरोप
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ प्रतिशोध की भावना से कार्रवाई की। पुलिसकर्मियों की फर्जी चिकित्सीय जांच कराकर दलित समाज के लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज कराए गए। याचिकाकर्ता का कहना है कि पुलिस के पास अपने आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, इसके बावजूद निर्दोष लोगों को आरोपी बनाया गया। संविधान और मानवाधिकारों का हवाला
अधिवक्ता अनिल प्रधान ने अपनी याचिका में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का उल्लेख करते हुए कहा है कि प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करने और अपनी बात रखने का अधिकार है। इसके बावजूद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के मौलिक अधिकारों का हनन किया। मेरठ पुलिस ने खुलेआम मानवाधिकारों का उल्लंघन किया और लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने का प्रयास किया। रवि गौतम से मारपीट का भी उल्लेख
याचिका में प्रदर्शन में शामिल अधिवक्ता रवि कुमार गौतम का भी उल्लेख किया गया है। आरोप लगाया गया है कि पुलिस उन्हें धरना स्थल से उठाकर एकांत स्थान पर ले गई, जहां उनके साथ मारपीट करते हुए अमानवीय व्यवहार किया गया। याचिकाकर्ता ने इसे मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का मामला बताते हुए अदालत से पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने और संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विधिक कार्रवाई के आदेश देने की मांग की है। अदालत के आदेश पर टिकी निगाहें
मामले को लेकर अब दलित समाज और पुलिस प्रशासन दोनों की निगाहें विशेष न्यायाधीश एससी/एसटी कोर्ट के निर्णय पर टिकी हैं। यदि अदालत प्रथम दृष्टया आरोपों को गंभीर मानते हुए मुकदमा दर्ज करने के आदेश देती है तो यह मामला मेरठ पुलिस प्रशासन के लिए बड़ी कानूनी चुनौती बन सकता है। वहीं, पुलिस विभाग की ओर से अभी तक याचिका में लगाए गए आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
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