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- DGCA Mandates Random Drug Testing For Indian Airline Crew | 25 Percent Rule
4 मिनट पहले
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DGCA सभी भारतीय एयरलाइंस के फ्लाइट क्रू की हर साल रैंडम जांच अनिवार्य करने की तैयारी में है। इसके तहत 25% से ज्यादा क्रू का साइकोएक्टिव पदार्थों के लिए यूरिन सैंपल से टेस्ट किया जाएगा।
यह जानकारी शीर्ष सरकारी अधिकारियों के सूत्रों ने दी है। मौजूदा नियमों के तहत लागू कर्मचारियों में से कम से कम 10% की हर साल रैंडम यूरिन जांच जरूरी है।
यह प्रस्ताव एयर इंडिया की फ्लाइट AI-2379 से जुड़ी घटना के बाद आया है। फुकेत से दिल्ली जा रही इस फ्लाइट की ऊंचाई अचानक कम हो गई थी, जिससे कुछ यात्री घायल हुए थे।
AI-2379 के पायलट को ड्यूटी से हटाया
सूत्रों के मुताबिक, AI-2379 के पायलट को ड्यूटी से हटा दिया गया है। यह फ्लाइट ओडिशा के ऊपर करीब 300 फीट नीचे आ गई थी। घटना में 20 यात्री और 4 केबिन क्रू सदस्य घायल हुए थे।
इस घटना की प्रारंभिक रिपोर्ट अगले 10 दिनों में आने की उम्मीद है। विमान में तीनों हाइड्रोलिक सिस्टम फेल होने की बात भी सामने आई है, जिसकी DGCA और एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) अलग-अलग जांच कर रहे हैं।
13 अगस्त से एयर इंडिया के सभी ग्रुप पायलटों की जांच
सूत्रों ने बताया कि एयर इंडिया 13 अगस्त से अपने सभी ग्रुप पायलटों की पूरी जांच करा रही है। इसमें मौजूदा नियमों के तहत प्रतिबंधित पदार्थों या दवाओं के इस्तेमाल की जांच की जा रही है।
एयर इंडिया इन जांचों की रिपोर्ट DGCA को सौंप रही है। DGCA इन रिपोर्ट्स की समीक्षा कर रहा है।
FIP ने ओरल-फ्लूड टेस्टिंग की मांग की
DGCA का प्रस्ताव फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स (FIP) की औपचारिक मांग के एक दिन बाद आया है। FIP ने मौजूदा साइकोएक्टिव पदार्थ जांच व्यवस्था में ओरल-फ्लूड टेस्टिंग को पूरक तरीका बनाने की मांग की थी।
FIP ने पायलटों की सालाना रैंडम जांच का न्यूनतम दायरा बढ़ाकर कम से कम 25% करने की सिफारिश की है। संगठन ने जोखिम के आधार पर हाइब्रिड मॉडल का सुझाव भी दिया है।
इसके तहत ज्यादा संख्या में होने वाली रैंडम और एयरपोर्ट पर की जाने वाली जांच के लिए ओरल-फ्लूड टेस्ट का इस्तेमाल किया जा सकता है। ज्यादा समय तक पदार्थ का पता लगाने या खास मेडिकल जरूरतों वाले मामलों में यूरिन टेस्ट जारी रखने की सिफारिश की गई है।
सिर्फ पदार्थ मिलने से नशे में होने का सबूत नहीं
FIP ने कहा है कि किसी पदार्थ का पता चलना अपने आप में पायलट के नशे में होने का सबूत नहीं माना जाना चाहिए। संगठन ने जांच प्रक्रिया में शुरुआती स्क्रीनिंग, कन्फर्मेटरी लैब टेस्ट, मेडिकल समीक्षा और अंतिम नियामकीय फैसला शामिल करने की सिफारिश की है।
फेडरेशन ने ओरल-फ्लूड टेस्टिंग की उपयोगिता जांचने के लिए 12 महीने का नियंत्रित पायलट प्रोग्राम चलाने की मांग की है। इसके अलावा, पायलटों के लिए साइकोएक्टिव पदार्थ और दवाओं की जानकारी से जुड़ा अनिवार्य कार्यक्रम शुरू करने का सुझाव दिया है।
इस कार्यक्रम में “चेक बिफोर यू टेक” यानी कोई दवा लेने से पहले उसकी जांच करने का तरीका शामिल होगा। इसका उद्देश्य पायलटों को प्रिस्क्रिप्शन, बिना पर्ची मिलने वाली और हर्बल दवाओं के बारे में जानकारी देना है।
