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राष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER) ने बिहार में शराबबंदी को खत्म करने का सुझाव दिया है। रिसर्च पेपर में कहा है कि शराबबंदी अपने मकसद में फेल रहा है। इसलिए इसे खत्म करने का समय आ गया है।

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वहीं, केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने एक बार फिर बिहार में शराबबंदी का गुजरात मॉडल लागू करने की डिमांड की है।

इंडिया पॉलिसी फोरम की स्टडी में क्या है, बिहार की तेज तरक्की के लिए इसे खत्म करना जरूरी है, सम्राट सरकार बात मानेगी, समझेंगे; बूझे की नाही में…।

सवाल-1ः NCAER की स्टडी में बिहार सरकार को क्या सुझाव दिया गया है?

जवाबः मशहूर टेक्नोक्रेट नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता वाली NCAER ने 6 से 8 अगस्त तक इंडिया पॉलिसी फोरम-2026 कार्यक्रम किया। इसमें बिहार के विकास को लेकर एक रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया गया।

जिसमें बिहार के तेज आर्थिक विकास के लिए शराबबंदी जैसे कानून को खत्म करने की सिफारिश की गई। रिसर्च पेपर की मुख्य बातें जानिए…

  • बिहार देश की आबादी का 9% से ज्यादा हिस्सा है। 2026 में जनसंख्या 13.2 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। 2047 तक विकसित भारत बनाने में बिहार की अहम भूमिका है, क्योंकि यह देश का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला और सबसे गरीब राज्य है।
  • राज्य सरकार 3 तरीके से पैसा जुटाती है। वस्तुओं और सेवाओं पर कर, कर एवं पंजीकरण शुल्क और भू-राजस्व।
  • कर और पंजीकरण शुल्क से ज्यादा पैसा जुटाने की गुंजाइश कम है। इसमें अभी की स्थिति से 10% तक ही अधिक बढ़ोत्तरी हो सकती है।
  • भू-राजस्व से भी आगे और अधिक कमाई नहीं की जा सकती। क्योंकि जमीन के लगातार छोटे-छोटे टुकड़े होने के कारण 99 प्रतिशत परिवारों के पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है। वास्तव में 95 प्रतिशत लोगों के पास 1 हेक्टेयर से भी कम जमीन है।
  • हमारा मानना है कि राज्य की तेज तरक्की के लिए अभी सबसे ज्यादा पैसा जुटाने का माध्यम ‘वस्तुओं और सेवाओं पर कर’ है। लेकिन यह तब होगा जब शराबबंदी को हटा दिया जाए और शराब पर एक्साइज ड्यूटी को फिर से लागू कर दिया जाए।

शराबबंदी का मकसद नहीं हुआ पूरा

रिसर्च पेपर में दावा किया गया है कि शराबबंदी अपने मुख्य मकसद को पूरा करने में सफल नहीं रहा है। अप्रैल 2016 में शराबबंदी लागू करने का मुख्य उद्देश्य यह सोच थी कि इससे घरेलू हिंसा कम हो जाएगी। हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में कोई कमी नहीं आई है। उल्टे बढ़े ही हैं।

  • शराबबंदी के आर्थिक परिणाम भी काफी गंभीर रहे। बंदी से पहले एक्साइज ड्यूटी राज्य की कमाई का महत्वपूर्ण जरिया था।
  • बंदी से पहले के 3 सालों में राज्य की कुल कमाई का लगभग 14 प्रतिशत था। शराबबंदी के कारण यह खत्म हो गया। इसके अलावा निगरानी और तस्करी रोकने के अभियानों पर होने वाला सरकारी खर्च भी बढ़ गया, जिससे राज्य का घाटा बढ़ रहा है।

BAI ने शराबबंदी खत्म करने के लिए लेटर लिखा

इस रिसर्च पेपर से पहले जुलाई में भारत में बीयर बनाने वाली कंपनियों की शीर्ष संस्था है ब्रुअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) ने भी CM सम्राट चौधरी को लेटर लिखकर शराबबंदी की समीक्षा करने की मांग की थी।

  • BAI के महानिदेशक विनोद गिरी ने लिखा था, ’10 सालों के अनुभव ने बताया है कि बिहार में शराबबंदी के बाद शराब गायब नहीं हुई है, सिर्फ सरकार के नियंत्रण से बाहर चली गई है। इससे राज्य को लाभ कम, नुकसान ज्यादा हो रहा है। इसलिए इस नीति की समीक्षा होनी चाहिए।’
  • BAI ने अनुमान लगाया है कि बिहार सरकार ने बीते 10 सालों में करीब 60,000 करोड़ रुपए का नुकसान सहा है। इसके अलावा होटल, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, परिवहन और सहायक उद्योगों को भी भारी आर्थिक नुकसान हुआ है।

सवाल-2ः क्या तेज तरक्की के लिए शराबबंदी खोलना ही विकल्प है?

जवाबः इसे 2 अर्थशास्त्रियों से समझिए…

सिर्फ पैसा कमाने के लिए शराबबंदी ना खोलें

अर्थशास्त्री और पटना यूनिवर्सिटी के शिक्षक अविरल पांडेय कहते हैं, ‘बिहार में शराबबंदी को केवल सरकार के राजस्व के नजरिये से देखना उचित नहीं होगा। NFHS-4 में 15-49 साल के बीच के 28.9% पुरुषों ने शराब पीने की जानकारी दी थी, जो NFHS-5 में 17% और NFHS-6 में 16.5% रही। वहीं, NFHS-4 में जिन महिलाओं के पति अक्सर नशे में रहते थे, उनमें 83.1% ने शारीरिक या यौन हिंसा की बात बताई थी, जबकि पति के शराब नहीं पीने की स्थिति में यह आंकड़ा 31.7% था।’

  • अविरल पांडेय कहते हैं, ‘NFHS-5 में ये आंकड़े क्रमशः 83.3% और 33.8% रहे। शराब पीने वालों में आई इस बड़ी कमी को देखते हुए कहा जा सकता है कि शराब की कमी ने महिलाओं की सुरक्षा और परिवार कल्याण को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया।’
  • अविरल पांडेय कहते हैं, ‘शराबबंदी के बावजूद अवैध शराब, तस्करी और नशीले पदार्थों की समानांतर अर्थव्यवस्था जैसी समस्याएं हैं और जहरीली शराब से होने वाली मौतें भी गंभीर चिंता की विषय हैं। इसलिए शराबबंदी को जारी रखने या समाप्त करने पर कोई जल्दबाजी में निर्णय नहीं होना चाहिए।’

पैसा जुटाने के लिए शराबबंदी से अलग ऑप्शन भी हैं

अर्थशास्त्री और पटना यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शांतनु कहते हैं, ‘बिहार के सामाजिक ताने बाने को देखते हुए अभी शराबबंदी खोलना उचित नहीं है। रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते क्राइम का जिक्र किया गया है। ऐसा नहीं है। क्राइम सिर्फ शराब पीकर ही नहीं होता, उसके कई अलग कारण होते हैं।’

डॉ. शांतुन कहते हैं, ‘NFHS-5 सर्वे के डेटा को देखें तो महिलाओं की प्रेग्नेंसी के दौरान हिंसा के मामलों में 2% की कमी आई है। जबकि, पड़ोसी राज्य UP में 0.7% और बंगाल में 1.5% की कमी थी। अगर पुरुषों में प्री-हाइपरटेंशन के मामले को देखें तो बिहार में बढ़ोत्तरी का रेट सिर्फ 1.8% था। जबकि, पड़ोसी UP में 10.9% और बंगाल में 4% था।’

सवाल-3ः …तो क्या सम्राट सरकार NCAER की सिफारिश मानेगी?

जवाबः फिलहाल इसकी संभावना कम है। नीतीश कुमार यानी JDU के सरकार में रहते बहुत मुश्किल है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी कई मौकों पर कह चुके हैं कि हम नीतीश कुमार के इस ऐतिहासिक फैसले को नहीं बदलेंगे।

10 अगस्त को मंत्री सुनील कुमार ने कहा, ‘बिहार में फिलहाल शराबबंदी कानून पूरी तरह लागू है और सरकार इसे लेकर अपने रुख पर कायम है।’

दरअसल, शराबबंदी का मामला सीधे तौर पर वोट बैंक से जुड़ा है। नीतीश कुमार ने शराबबंदी लागू कर महिला वोटरों को अपनी तरफ किया है। महिलाओं में नीतीश कुमार सहित NDA की पैठ इस तरह के कानून से ही है। इसे ऐसे समझिए…

  • 2025 विधानसभा चुनाव में 243 में से 130 सीटों पर महिलाओं ने पुरुषों से अधिक वोट डाले। इन 130 में 114 मतलब 88% सीटों पर नीतीश लीड NDA जीता।
  • 2020 विधानसभा चुनाव में 167 सीटों पर महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा वोटिंग की थी। इसमें से 92 सीटें NDA जीता। टोटल 125 सीटों में 92 सीटें महिलाओं ने जिताए।

प्रशांत किशोर ने शराबबंदी खत्म करने की बात कही, हार गए

  • नवंबर 2025 विधानसभा चुनाव के पूरे कैंपेन के दौरान और पहले जनसुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर ने सरकार बनने पर एक घंटे के अंदर शराबबंदी खत्म करने का वादा किया। चुनाव में सफलता नहीं मिली।
  • जनसुराज को सिर्फ 3.3% मतलब करीब 17 लाख वोट मिले। 238 में से 236 कैंडिडेट की जमानत जब्त हो गई।
  • वहीं, जुलाई 2026 में बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर ने शराबबंदी पर एक शब्द भी नहीं बोला। भाजपा के किले को ढाह दिया।

सवाल-4ः शराबबंदी को लेकर राजनीतिक दलों की क्या राय है?

जवाबः JDU को छोड़कर लगभग सभी पार्टियों के नेता शराबबंदी को खत्म करने की समय-समय पर डिमांड कर चुके हैं। 9 अगस्त को एक बार फिर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने पूर्ण शराबबंदी को खत्म करने की मांग की।

उन्होंने कहा कि यहां भी गुजरात मॉडल लागू किया जाना चाहिए। परमिट के आधार पर शराब की बिक्री होनी चाहिए। बाकी नेताओं की सिलसिलेवार राय जानिए…

  • 9 अप्रैल को BJP विधायक विनय बिहारी ने कहा, ‘बंदी का कोई असर नहीं है। सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए कि हम कैसे काम करें ताकि राजस्व भी आए और लोगों को परेशानी भी न हो।’
  • 6 अप्रैल को RJD नेता तेजस्वी यादव ने कहा, ‘शराबबंदी कानून मजाक बन गया है। 40,000 करोड़ का अवैध समानांतर शराब कारोबार खड़ा हो गया है। 16 लाख लोगों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन बड़े सप्लायर और तस्कर अभी तक पकड़े नहीं गए।’
  • 5 अप्रैल को बिहार सरकार के मंत्री और JDU नेता अशोक चौधरी ने साफ कहा- ‘नीतीश कुमार के CM पद से हटने के बाद शराबबंदी खत्म होगी या नहीं, इस पर अभी कुछ भी कहना मुश्किल है।’
  • मोतिहारी जहरीली शराब कांड के बाद 3 अप्रैल को केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा था- ‘शराबबंदी के पीछे सरकार की मंशा और सोच सही है, लेकिन इसकी आड़ में पनप रहे अवैध कारोबार पर प्रभावी नियंत्रण कैसे किया जाए, इस पर गंभीर चर्चा की जरूरत है।’
  • 17 फरवरी को विधानसभा में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) विधायक माधव आनंद ने कहा था, ‘अब समय आ गया है, जब इस कानून की व्यापक समीक्षा होनी चाहिए। इसे बेहतर ढंग से लागू करने, जागरूकता बढ़ाने और जहां जरूरी हो, वहां संशोधन करना चाहिए।’
  • 18 फरवरी को विधानसभा में संसदीय कार्य मंत्री चौधरी ने कहा था, ‘शराबबंदी कानून की समीक्षा का कोई प्रस्ताव नहीं है। बिहार में तय कानून के तहत यह प्रभावी ढंग से लागू रहेगा। किसी भी स्तर पर इसकी समीक्षा का कोई विचार नहीं है।’



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