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12 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश हाथी दिवस मनाया जाता है। 2012 में शुरू हुए इस दिवस का उद्देश्य एशियाई और अफ्रीकी हाथियों की दुर्दशा के प्रति लोगों को जागरूक किया जा सके। मथुरा में वन्य जीवो के संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्था वाइल्ड लाइफ SOS 16 साल से हाथियों के संरक्षण का काम कर रही है। यह संस्था अब तक 34 हाथियों को बचा चुकी है। जिनमें कुछ महावत के कब्जे में थे या कुछ ऐसे हैं जो किसी दुर्घटना का शिकार होकर घायल हो गए थे। बचाए गए यह हाथी अब इस संस्था के संरक्षण केंद्र में आराम की जिंदगी जी रहे हैं। 2010 में शुरू हुआ था सेंटर मथुरा के फरह इलाके के चुरमुरा गांव में वाइल्ड लाइफ SOS संस्था ने 16 साल पहले 2010 में हाथी संरक्षण केंद्र खोला। एलिफेंट कंज़र्वेशन एंड केयर सेंटर (ECCC) भारत का पहला और एकमात्र खास हाथी सेंटर है जिसे 2010 में उत्तर प्रदेश फ़ॉरेस्ट डिपार्टमेंट के साथ मिलकर बनाया गया था। इस सेंटर को बनाने का मकसद उन हाथियों को फिर से बसाना था जिन्हें बहुत ज़्यादा परेशान किया गया था और जिनका शोषण हुआ था। ECCC अब 34 से ज़्यादा बचाए गए हाथियों का घर है और यह हाथी संरक्षण को सपोर्ट करने के लिए लोगों की सोच बदलने के लिए एक जीता-जागता कंज़र्वेशन एजुकेशन प्लेटफ़ॉर्म है। आजीवन देखभाल में मिलेगा सहयोग 12 अगस्त को विश्व हाथी दिवस से पहले, वाइल्डलाइफ एसओएस ने अंतरराष्ट्रीय हाथी देखभाल विशेषज्ञ माइक मैक्लुर के नेतृत्व में मैक्लुर इंटरनेशनल कंसल्टिंग (एम.आई.सी) के साथ एक नए अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से बचाए गए हाथियों की आजीवन देखभाल में सुधार के लिए समझौता किया। इस सहयोग से भारत में बंधक हाथियों को बचाने और उनके पुनर्वास में वाइल्डलाइफ़ एसओएस के लगभग दो दशकों के अनुभव और हाथियों की भलाई व देखभाल करने वालों की ट्रेनिंग में ‘एम.आई.सी’ की अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञता एक साथ आई। मैक्लूअर इंटरनेशनल कंसल्टिंग ने सेंटर पर ली जानकारी मैक्लूअर इंटरनेशनल कंसल्टिंग ने हाल ही में मथुरा स्थित हाथी संरक्षण एवं देखभाल केंद्र में एक हफ़्ता बिताया और वाइल्डलाइफ़ एसओएस के पशु चिकित्सकों और हाथियों की देखभाल करने वालों के साथ मिलकर प्रैक्टिकल ट्रेनिंग सेशन आयोजित किए। इन सेशन में हाथियों की सेहत, व्यवहार और जीवन की कुल गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए प्रैक्टिकल और सबूतों पर आधारित तरीकों पर ध्यान दिया गया, साथ ही टीमों के बीच लगातार जानकारी साझा करने और सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया गया। इस दौरान क्षमता निर्माण कार्यक्रम में कई क्षेत्रों पर ध्यान दिया गया, जैसे कि पैरों की बेहतर देखभाल और चलने-फिरने की क्षमता, सकारात्मक प्रोत्साहन वाली ट्रेनिंग, हाथियों का सामाजिक मेलजोल, उनके माहौल को बेहतर बनाना और उनकी देखभाल करने वालों का विकास। ये तरीके पुरानी चोटों से जूझ रहे हाथियों के आराम और चलने-फिरने की क्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं, साथ ही उनके स्वस्थ व्यवहार और मजबूत सामाजिक रिश्तों को भी बढ़ावा दे सकते हैं। हाथियों की बेहतर देखभाल में मिलेगी मदद: DFO मथुरा के डी.एफ.ओ, वेंकट श्रीकर पटेल आई.एफ.एस, ने बताया बचाए गए हाथियों की भलाई के लिए लगातार सीखने, ज़िम्मेदारी से देखभाल करने और मज़बूत सहयोग की ज़रूरत होती है। ऐसी पहल से जानकारी साझा करने और हाथियों की भलाई के लिए काम करने वाली टीमों की क्षमता बढ़ाने के बेहतरीन मौके मिलते हैं। हम वाइल्डलाइफ़ एसओएस की उन कोशिशों की तारीफ़ करते हैं, जिनसे इस सेंटर में रखे गए हाथियों की देखभाल के स्टैंडर्ड को बेहतर बनाने में मदद मिलती है। बचाए गए हाथियों की है अलग कहानी वाइल्डलाइफ़ एसओएस के सह-संस्थापक और सीईओ, कार्तिक सत्यनारायण ने बताया हाथी को रेस्क्यू करना उसके ठीक होने की यात्रा की एक शुरुआत है। हमारी ज़िम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है, कि रेस्क्यू किए गए हर हाथी को ज़िंदगी भर सबसे अच्छी देखभाल मिले। इस तरह के सहयोग से हमें लगातार सीखने, अपने काम के तरीकों को बेहतर बनाने और हाथियों के पुनर्वास और कल्याण से जुड़ी मुश्किल चुनौतियों के लिए नए नज़रिए अपनाने में मदद मिलती है। संस्था की सह-संस्थापक और सचिव, गीता शेषमणि ने कहा कि बचाए गए हर हाथी की अपनी एक अलग कहानी है। उनके ठीक होने के लिए धैर्य, विशेषज्ञता और लगातार सुधार करना आवश्यक है। अपने अनुभव को अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञता के साथ मिलाकर, हम अपनी देखरेख में रहने वाले हाथियों की देखभाल की गुणवत्ता को और बेहतर बना सकते हैं और उनके ठीक होने और फलने-फूलने के लिए बेहतर अवसर पैदा कर सकते हैं। माइक मैक्लूअर ने कहा कि वाइल्डलाइफ़ एसओएस ने हाथियों को बचाने के कुछ सबसे मुश्किल मामलों में अनुभव रखने वाली एक टीम बनाई है। यह सहयोग ज्ञान और विचारों का सही आदान-प्रदान है, और हम साथ मिलकर हाथियों की भलाई के लिए नए तरीके खोजते रह सकते हैं।



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