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लखनऊ के नेशनल पीजी कॉलेज में इंटैक ओरिएंटेशन कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और इस क्षेत्र में उपलब्ध करियर के अवसरों पर जानकारी दी। इस कार्यक्रम में लगभग 200 विद्यार्थियों ने भाग लिया और विरासत संरक्षण से जुड़े विभिन्न पहलुओं को समझा। यह ओरिएंटेशन कार्यक्रम नेशनल पीजी कॉलेज, लखनऊ के इतिहास विभाग की ओर से इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) लखनऊ चैप्टर के सहयोग से आयोजित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को भारत की मूर्त और अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ-साथ इस क्षेत्र में उपलब्ध शैक्षणिक और व्यावसायिक संभावनाओं से परिचित कराना था। सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण की जानकारी दी इंटैक लखनऊ चैप्टर के निदेशक धर्मेंद्र मिश्रा कार्यक्रम के मुख्य वक्ता थे। उन्होंने इंटैक की स्थापना, उसके उद्देश्यों और देश की सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण में उसकी भूमिका पर विस्तृत जानकारी प्रदान की। मिश्रा ने बताया कि विरासत संरक्षण आज रोजगार और शोध का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया है, जिसमें युवाओं की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। धर्मेंद्र मिश्रा ने इंटैक लखनऊ की विभिन्न संरक्षण परियोजनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने छोटा इमामबाड़ा के प्रवेश द्वार और ऐतिहासिक रिफा-ए-आम क्लब में चल रहे पुनरुद्धार कार्यों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप, सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और इंडस्ट्री आधारित स्नातकोत्तर कार्यक्रमों के बारे में बताया। मिश्रा के अनुसार, ये पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण और क्षेत्रीय अनुभव प्रदान करते हैं, जिससे विरासत प्रबंधन, संग्रहालय अध्ययन, पुरातत्व, संरक्षण, पर्यटन और सांस्कृतिक प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में बेहतर रोजगार के अवसर मिलते हैं। स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम शुरू करने का सुझाव दिया मिश्रा ने महाविद्यालय में हेरिटेज कंजर्वेशन और टूर गाइडिंग में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम शुरू करने का सुझाव दिया। उन्होंने तर्क दिया कि प्रशिक्षित हेरिटेज गाइडों की बढ़ती मांग को देखते हुए, ऐसे पाठ्यक्रम युवाओं के लिए रोजगार, कौशल विकास और स्वरोजगार के नए अवसर पैदा कर सकते हैं। उन्होंने हेरिटेज वॉक को स्थानीय इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से लोगों को जोड़ने का एक प्रभावी माध्यम भी बताया। अपने व्याख्यान के दौरान, धर्मेंद्र मिश्रा ने उत्तर प्रदेश, विशेषकर लखनऊ की पारंपरिक कला, शिल्प, पॉटरी और स्थानीय हस्तशिल्पों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।
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