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रक्षाबंधन पर इस बार बनारस की प्रसिद्ध गुलाबी मीनाकारी से बनी राखियां खास आकर्षण का केंद्र बनी हैं। चांदी पर हाथों से की गई बारीक मीनाकारी वाली इन राखियों की मांग देश के साथ विदेशों में भी बढ़ रही है। कारीगर रोहन विश्वकर्मा ने इस बार 40 अलग-अलग डिजाइन की राखियां तैयार कीं। हर डिजाइन में 100-100 राखियां थीं। कारीगर के मुताबिक, इस बार कुल करीब 3500 राखियां बनाई गईं। अब मीनाकारी को नई पहचान मिल रही है और विदेशों में भी इसकी मांग बढ़ी है। इस बार मॉरीशस में 1500, अमेरिका में 1200 और कनाडा में 1000 राखियां भेजी गई हैं। रोहन विश्वकर्मा ने बताया कि गुलाबी मीनाकारी से बनी ये राखियां सिर्फ एक दिन के त्योहार तक सीमित नहीं हैं। इन्हें इस तरह डिजाइन किया गया है कि राखी खोलने के बाद इसे ब्रेसलेट, चोकर या अन्य ज्वेलरी के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सके। इस बार कारीगरों ने पारंपरिक गुलाबी रंग के साथ नीले और पीले जैसे दूसरे रंगों का भी इस्तेमाल किया है। राखी में गुलाबी के साथ नीले-पीले रंगों का प्रयोग रोहन विश्वकर्मा बताते हैं कि इस बार उन्होंने राखी में पारंपरिक गुलाबी रंग के साथ दूसरे रंगों का भी इस्तेमाल किया है। अब तक गुलाबी मीनाकारी मुख्य रूप से अपने पारंपरिक गुलाबी रंग के लिए जानी जाती रही है। इस बार राखियों में गुलाबी के साथ नीला और पीला समेत दूसरे रंग भी हैं। रोहन विश्वकर्मा के मुताबिक, ग्राहकों की पसंद बदलने के कारण इस बार रंगों और डिजाइन में नए प्रयोग किए गए हैं। पारंपरिक गुलाबी रंग के साथ दूसरे रंगों के मेल वाली राखियों की भी मांग है। राखी के बाद ब्रेसलेट और चोकर भी बनेगी रोहन बताते हैं कि इस बार बनाई गई राखियों की एक खासियत यह भी है कि इन्हें सिर्फ रक्षाबंधन तक सीमित नहीं रखा गया है। राखी खोलने के बाद इसे ब्रेसलेट की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। कुछ डिजाइन ऐसे हैं, जिन्हें चोकर और अन्य ज्वेलरी के रूप में भी पहना जा सकता है। कारीगरों ने राखी को इस तरह डिजाइन किया है कि भाई की कलाई पर बंधने के बाद भी उसकी उपयोगिता बनी रहे। चांदी पर हाथों से हो रही पूरी कारीगरी गुलाबी मीनाकारी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें मशीन का इस्तेमाल नहीं होता। पूरी कारीगरी हाथों और पारंपरिक औजारों से की जाती है। चांदी की पट्टी से लेकर डिजाइन उकेरने और रंग भरने तक हर प्रक्रिया में बारीकी की जरूरत होती है। 500 से 2 हजार तक बिक रही राखियां रोहन विश्वकर्मा ने बताया कि वे चाहते हैं कि उनकी कला सभी तक पहुंचे, इसलिए उन्होंने राखियों का दाम 500 से 2 हजार रुपए तक रखा है। हालांकि, उनके पास इतने ऑर्डर हैं कि वे स्थानीय लोगों या शोरूम के लिए अलग से राखियां नहीं बना पाते हैं। ऐसे बनती है गुलाबी मीनाकारी छठी पीढ़ी संभाल रही खानदानी कला रोहन विश्वकर्मा बताते हैं कि गुलाबी मीनाकारी उनके परिवार का खानदानी व्यवसाय है। वह परिवार की छठी पीढ़ी के रूप में इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने बताया कि बचपन से ही वह अपने पिता रमेश कुमार विश्वकर्मा को काम करते देखते थे। करीब 9-10 साल की उम्र में औजार पकड़कर इस कला को सीखना शुरू किया। उनके पिता राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कारीगर हैं और परिवार कई पीढ़ियों से इस पारंपरिक कला से जुड़ा हुआ है। पहले घर और शोरूम तक सीमित था काम रोहन ने बताया कि पहले उनका काम घर और सीमित बाजार तक ही था। मशीन से बने और नकली डिजाइन बाजार में आने के कारण पारंपरिक कारीगरों के सामने अपनी पहचान बनाए रखना चुनौती था। एक समय ऐसा भी आया, जब परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई और काम सीमित हो गया। लेकिन धीरे-धीरे गुलाबी मीनाकारी को अलग पहचान मिली और इसकी मांग बढ़ने लगी। अब देश के अलग-अलग शहरों के साथ विदेशों से भी ग्राहक इस कला के लिए संपर्क कर रहे हैं। रोहन के अनुसार, उनके पास लगातार ऑर्डर आ रहे हैं और कई महीनों की बुकिंग पहले से है। बारीक काम से गर्दन, कमर और आंखों पर असर कारीगर भरत ने बताया कि गुलाबी मीनाकारी का काम घंटों बैठकर करना पड़ता है। इसमें बेहद बारीकी से डिजाइन बनाने और रंग भरने का काम होता है। लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठने से कारीगरों को शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। रोहन बताते हैं कि लगातार नीचे झुककर काम करने से गर्दन और कमर में दर्द होने लगता है। लंबे समय तक बैठने से घुटनों और पैरों पर भी असर पड़ता है। वहीं, बारीक डिजाइन और मीना पीसने के दौरान लगातार आंखों पर जोर पड़ता है। नई पीढ़ी को जोड़ना सबसे बड़ी चुनौती भरत बताते हैं कि आज की युवा पीढ़ी को इस कला से जोड़ना आसान नहीं है। पहले परिवार के बच्चे कम उम्र से ही माता-पिता के साथ बैठकर काम सीखते थे। अब युवा लंबे समय तक बैठकर बारीक काम करने में कम रुचि दिखाते हैं। उन्होंने बताया कि कई कॉलेजों के छात्र और महिलाएं प्रशिक्षण लेने के लिए आते हैं। महिलाओं को भी गुलाबी मीनाकारी का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, लेकिन कुछ दिनों की ट्रेनिंग में इस कला को पूरी तरह सीखना संभव नहीं है।



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