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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर की प्रधान न्यायाधीश, परिवार अदालत द्वारा जारी उस वसूली वारंट को रद्द कर दिया है, जो भरण-पोषण की बकाया राशि वसूलने के लिए एक पति के खिलाफ जारी किया गया था। परिवार अदालत ने श्रीमती पिंकी उर्फ मेघा बनाम अमित कुमार केस में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 128 के तहत 16 अप्रैल 2025 को गुजारा भत्ता वसूली वारंट जारी किया था। अमित कुमार ने इस वारंट को चुनौती देते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। जानिये क्या है मामला याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष दलील दी कि परिवार अदालत का आदेश सुप्रीम कोर्ट के रजनेश बनाम नेहा एवं अन्य मामले के पैरा 132 में तय कानून पर विचार किए बिना पारित किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में स्पष्ट किया था कि भरण-पोषण आदेशों का प्रवर्तन हिंदू विवाह अधिनियम, 1956 की धारा 28ए, घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 20(6), या सी आर पी सी की धारा 128 के तहत किया जा सकता है, लेकिन वसूली सिविल न्यायालय की डिक्री की तरह सिविल प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों विशेष रूप से धारा 51, 55, 58, 60 तथा आदेश 21 के अनुसार होनी चाहिए। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि परिवार अदालत ने सी पी सी में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना ही सीधे वसूली वारंट जारी कर दिया, जो कानूनन गलत है। न्यायमूर्ति दीपक वर्मा की एकलपीठ ने माना कि यह मामला पूरी तरह से कानून के तय सिद्धांत से जुड़ा है और इसमें विचार के लिए कोई अन्य बिंदु शेष नहीं है। कोर्ट ने कहा 16 अप्रैल 2025 का वसूली वारंट रद्द किया जाता है।संबंधित अदालत भरण-पोषण की बकाया राशि को सिविल न्यायालय की डिक्री के रूप में ही पी सी के प्रावधानों और रजनेश मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार वसूल करने के लिए स्वतंत्र होगी। इस फैसले से यह स्पष्ट है कि भरण-पोषण की वसूली में सीधे वसूली वारंट जारी करने की बजाय सी पी सी में निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट रजनेश बनाम नेहा मामले में पहले ही स्पष्ट कर चुका है।



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