![]()
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने और दहेज प्रताड़ना के मामले में दोषी ठहराए गए पति को बरी कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि पति-पत्नी के बीच केवल विवाद या अलगाव आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने यह फैसला तब सुनाया जब यह स्पष्ट था कि आत्महत्या से करीब साढ़े पांच महीने पहले से दोनों के बीच कोई संपर्क या बातचीत नहीं थी। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने अंकुर टंडन की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। निचली अदालत ने अंकुर को दहेज प्रताड़ना, आत्महत्या के लिए उकसाने और दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत दोषी ठहराया था। कोई साक्ष्य नहीं मिला उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 306 के तहत दोषसिद्धि के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि आरोपी ने आत्महत्या से ठीक पहले या उसके निकट समय में ऐसा कोई कार्य किया हो, जिससे पीड़िता आत्महत्या के लिए प्रेरित या विवश हुई हो। इस मामले में ऐसा कोई साक्ष्य सामने नहीं आया। न्यायालय ने दहेज मांगने के आरोपों पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि छह लाख रुपये दहेज दिए जाने के संबंध में अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान परस्पर विरोधी थे। जमीन बेचने की तारीख, उससे मिली राशि और कथित भुगतान का भी कोई विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सका। इन परिस्थितियों में अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा। इन तथ्यों के आधार पर, हाईकोर्ट ने निचली अदालत की दोषसिद्धि और सजा को निरस्त करते हुए पति को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
Source link